बात 1970 के दशक की है। धनबाद जिले के सरायढेला स्थित काली मंदिर का परिसर, उस दिन किसी युद्धभूमि जैसा प्रतीत हो रहा था। पारंपरिक हथियारों से लैस आदिवासी समुदाय का हुजूम वहां जुटा था। उनके हाथों में तीर-धनुष, फरसा, कुल्हाड़ी जैसे हथियार थे और दिलों में वर्षों का दमन झेलने का गुस्सा। बिनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन के नाम की गूंज उस माहौल को क्रांति की चिंगारी से भर रही थी। ढोल-नगाड़ों की तेज आवाज़, आक्रोश भरे नारे— सब मिलकर इस सभा को एक चेतावनी में बदल चुके थे।इस चेतावनी का निशाना वे बाहरी लोग थे, जो गांवों में बस कर स्थानीय आदिवासी समाज का शोषण कर रहे थे। उनके खेत हड़प लिये जाते थे, महिलाओं के साथ अमानवीय बर्ताव होता था, और पुलिस-प्रशासन मौन दर्शक बना रहता था।शिबू सोरेन यानी ‘गुरूजी’ ने इस सभा को संबोधित करते हुए कहा था— “यह अन्याय के खिलाफ न्याय की हुंकार है। यह आखिरी चेतावनी है, अब अन्याय बर्दाश्त नहीं होगा।” उनके स्वर में सिर्फ गुस्सा नहीं था, बल्कि वह संकल्प भी था, जो आगे चलकर पूरे झारखंड के आदिवासियों की ताकत बना।इस सभा के बाद पूरे क्षेत्र में हलचल मच गई। यह कोई आम राजनीतिक रैली नहीं थी, यह शोषण के खिलाफ एक क्रांतिकारी उद्घोष था। स्थानीय प्रशासन सकते में आ गया और जमीन से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान देना शुरू किया गया।यह वही क्षण था जब शिबू सोरेन, सिर्फ एक नेता नहीं रहे, वे जनआंदोलन का चेहरा बन गए। यही संगठित आक्रोश बाद में झामुमो की नींव बना और झारखंड अलग राज्य आंदोलन की चेतना का बीज।