टुंडी के पोखरिया गांव की शांत पहाड़ियों के बीच बसा एक मिट्टी का छोटा-सा आश्रम—बाहरी दुनिया के लिए सामान्य, लेकिन झारखंड की आत्मा के लिए एक क्रांतिकारी तीर्थ। यही वह स्थल था, जहां शिवचरण मांझी ने संघर्ष की राह पर पहला कदम रखा, और ‘शिबू सोरेन’ बने—जनता के ‘गुरुजी’।यह आश्रम कोई धार्मिक स्थल नहीं था। यह था संघर्ष की पाठशाला, जहां खेत-खलिहानों से लौटे गरीब, आदिवासी, मजदूर रात के अंधेरे में दीपक की लौ के सहारे पढ़ते थे—अपने हक, अधिकार और आज़ादी की बातें।गुरुजी की रात्रि पाठशाला ने न केवल साक्षरता फैलाई, बल्कि चेतना का दीप जलाया। यहां तीर-धनुष चलाना सिखाया गया, लेकिन उद्देश्य था अन्याय के खिलाफ विद्रोह—not नफरत, बल्कि न्याय की लड़ाई।पोखरिया आश्रम ही वह जगह थी, जहां:महाजनी शोषण और सूदखोरों के खिलाफ आंदोलन की रूपरेखा बनी।सामूहिक खेती की सोच जन्मी।गांव की महिलाओं को नशे से मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठा।और सबसे अहम—जन-संगठन की शक्ति को पहचाना गया।पुलिस और जमींदारों के लिए यह आश्रम आंख की किरकिरी बन गया, लेकिन आम जनता के लिए यह एक आशा और आत्मसम्मान का तीर्थ बन चुका था।यही वह मिट्टी थी, जहां झारखंड राज्य का सपना आकार लेने लगा। पोखरिया आश्रम एक प्रयोगशाला था, और गुरुजी थे उस प्रयोग के मार्गदर्शक।
आज जब हम शिबू सोरेन को याद करते हैं, तो पोखरिया की उस मिट्टी की खुशबू भी महसूस होती है—जहां से उठी थी आवाज, जिसने इतिहास को मोड़ दिया।