झारखंड आंदोलन के सबसे प्रखर चेहरा रहे शिबू सोरेन का सियासी जीवन उतार-चढ़ाव और संघर्ष की मिसाल रहा है। उन्हें केवल एक राजनेता के तौर पर नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता के प्रतीक के रूप में देखा गया। ‘गुरुजी’ के नाम से प्रसिद्ध शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन 1970 के दशक में आदिवासियों की जमीन की लड़ाई से शुरू हुआ और देश के कोयला मंत्री तथा झारखंड के मुख्यमंत्री तक पहुंचा।पहला चुनाव और शुरुआती संघर्षशिबू सोरेन ने 1977 में टुंडी विधानसभा और दुमका लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हार के बाद उन्होंने संताल परगना को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाया। उन्होंने महाजनों-साहूकारों से आदिवासी जमीन छुड़ाने का जनांदोलन चलाया। इसी आंदोलन ने उन्हें संताल परगना में लोकप्रियता दिलाई।1980 में पहली जीत और जेएमएम का उदय1980 के लोकसभा उपचुनाव में उन्होंने दुमका से जीत दर्ज की और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के पहले सांसद बने। इसी साल के विधानसभा चुनाव में संताल परगना की 18 में से 9 सीटें झामुमो ने जीतीं, जिससे बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया।लोकसभा में लगातार जीत और केंद्र में जगह1984 में कांग्रेस के पृथ्वीचंद्र किस्कू से हार के बावजूद गुरुजी ने 1986, 1989, 1991 और 1996 के लोकसभा चुनाव में दुमका से जीत हासिल की। 2002 में वे राज्यसभा पहुंचे और 2004 में एक बार फिर दुमका से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद मनमोहन सिंह सरकार में कोयला मंत्री बने।चिरुडीह हत्याकांड और इस्तीफा1975 के चिरुडीह कांड में हत्या के आरोपों के कारण उन्हें 2004 में केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि इस मामले में 2008 में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया।तीन बार मुख्यमंत्री लेकिन हर बार अस्थिरता15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य बना। शिबू सोरेन राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका पहला कार्यकाल महज 10 दिन चला (2 से 11 मार्च 2005)। 2008 में वे दूसरी बार सीएम बने, लेकिन विधानसभा में बहुमत सिद्ध नहीं कर पाए। 2009 में तीसरी बार उन्होंने बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाई, लेकिन संसद में यूपीए के पक्ष में वोट देने के कारण भाजपा ने समर्थन वापसी कर लिया और सरकार गिर गई।सीएम रहते चुनाव हारे2008 में सीएम बनने के बाद उन्हें विधानसभा में चुनकर आना था। उन्होंने तमाड़ उपचुनाव लड़ा लेकिन झारखंड पार्टी के राजा पीटर से हार गए। यह एक असाधारण घटना थी—राज्य का मुख्यमंत्री चुनाव हार गए। वर्ष 2020 में वे झारखंड से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। शिबू सोरेन की राजनीतिक यात्रा न सिर्फ झारखंड की राजनीति का जीवंत दस्तावेज है, बल्कि यह आदिवासी चेतना, अस्मिता और संघर्ष की आवाज भी है। उनकी विरासत झारखंड की हर परत में मौजूद रहेगी।