रांची | झारखंड सरकार की ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह की अध्यक्षता में आज रांची में मनरेगा एवं विकसित भारत–गारंटी (VB-GRAM-G) के प्रावधानों को लेकर एक अहम बैठक आयोजित की गई। बैठक में ग्रामीण विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, मनरेगा आयुक्त, विशेषज्ञ, शिक्षाविद, सिविल सोसाइटी संगठनों के प्रतिनिधि एवं विभिन्न स्टेकहोल्डर्स शामिल हुए। बैठक में मनरेगा और VB-GRAM-G के प्रावधानों की गहन समीक्षा के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि 100 दिनों की वैधानिक रोजगार गारंटी को 125 दिन करने का प्रस्ताव ज़मीनी हकीकत से दूर और भ्रामक है। श्रम बजट के स्थान पर नॉर्मेटिव एलोकेशन, मजदूरी दर का केंद्रीकरण और 60 दिनों का अनिवार्य मोराटोरियम झारखंड जैसे श्रमिक-प्रधान राज्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है। दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि झारखंड में बड़ी संख्या में भूमिहीन मजदूर हैं, जिनके लिए ये प्रावधान आजीविका पर सीधा प्रहार हैं। इससे पलायन, भुखमरी और सामाजिक असुरक्षा का खतरा बढ़ेगा तथा राज्य में संचालित कृषि एवं बागवानी आधारित योजनाएं भी प्रभावित होंगी। दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में बायोमेट्रिक अटेंडेंस को अनिवार्य करना व्यावहारिक चुनौतियां पैदा करेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कुल व्यय का 40 प्रतिशत वित्तीय भार राज्यों पर डालना संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ है। मौजूदा परिस्थितियों में इससे झारखंड पर हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है। राज्यों को विश्वास में लिए बिना केंद्र सरकार द्वारा ऐसी योजनाएं लागू करना संघीय व्यवस्था पर सीधा प्रहार है।ज्याँ द्रेज ने कहा कि VB-G RAM G में सभी अधिकार एवं क्षमता केंद्र सरकार के द्वारा ही फिक्स किया जाएगा । इसमें मुख्य तौर पर पांच चीजों को जिक्र किया गया जैसे 1. कहां और कब यह कानून लागू करना है 2. फाइनेंशियल फ्रेमवर्क 3. 60 दिन के डिस्कंटीन्यूएशन 4. सेंट्रल गवर्नमेंट के अलग-अलग स्कीम को कन्वर्जेंस करने हेतु एक्टिविटी को लिस्ट करना। 5. टेक्नोलॉजी का अधिकतर समेकन। झारखंड में अगले 5.5 महीने में मनरेगा पहले जैसे ही चलते रहेगी। 6 महीना के बाद जो नया स्कीम आ रही है उसमें क्या प्रावधान किया जाएगा उसको देखते हुए एक उचित गाइडलाइन स्टेट के द्वारा बनाया जाए । मनरेगा अंतर्गत किए गए कार्यों का विस्तार से जांच होना चाहिए । सोशल ऑडिट होना चाहिए ताकि ट्रांसपेरेंसी पर कार्यों किया जा सके। दीवार लेखन हो, मजदूरों को कार्यों उपलब्ध कैसे हो सके, उसके लिए बड़े पैमाने पर काम मांगो अभियान जैसा अभियान चलाना चाहिए।सामाजिक कार्यकर्ता बलराम के द्वारा बताया गया कि मनरेगा में ग्राम सभा का क्षमता को बढ़ावा दिया गया है और पैसा कानून में भी ग्राम सभा को महत्व दिया गया है लेकिन यह नया कानून VB-G RAM G में Top to Down एप्रोच के तहत केंद्रीय सरकार के द्वारा बजट का एलोकेशन किया जाएगा। काम का गारंटी सिर्फ राज्य सरकार का जिम्मेदारी है । विभिन्न शर्तों को देखते हुए यह लगता है कि केंद्रीय सरकार से प्राप्त होने वाले 60% फंड का उपलब्धता में काफी कठिनाई होगी। वर्तमान में 12 महीना काम का उपलब्धता होने के बावजूद लगभग 50 दिवस ही काम दिया जा सका। अब दो महीना का कृषि ब्रेक का जिक्र किया गया है, इसको देखते हुए 125 कार्य दिवस मुहैया कराना नामुमकिन सा लगता है। झारखंड में लगभग 575 ऐसा गांव है जिसमें नेटवर्क नहीं है आज के दिन में इस तरह का गांव में बायोमेट्रिक एवं अन्य तकनीकी टेक्नोलॉजी का उपयोग करना काफी चुनौतीपूर्ण है।सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हैरिस के द्वारा बताया गया की नया कानून में 2 महीना का कृषि कार्य हेतु जो ब्रेक का जिक्र किया गया है, वह झारखंड जैसा राज्य के लिए काफी समस्या पैदा कर सकती है । झारखंड में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण कार्य बरसात के समय (जुलाई से सितंबर) किया जाता है जिसमें कठिनाई हो सकती है। और कुआं जैसे स्क्रीम को भी कभी-कभी समय में पूरा करने हेतु जोर दिया जाता है और यह 2 महीना का काम ब्रेक होने से बहुत सारा कुआं धसने का भी संभावना हो सकती है। उनके द्वारा यह कहा गया की 40% व्यय जो राज्य के द्वारा बहन करने की बात नया कानून में कही गई है। झारखंड सरकार को नया कानून लागू नहीं करना चाहिए। साथ ही झारखंड सरकार अपने राज्य के लिए एक रोजगार गारंटी का नया कानून लाए जो राज्य द्वारा संप्रेषित होगा। उनके द्वारा यह भी बताया गया कि अनइंप्लॉयमेंट एलाउंस में राज्य को ही जवाबदेही किया गया, केंद्र सरकार का कोई जवाबदेही का जिक्र नया कानून में नहीं किया गया। मीटिंग में उपस्थित सामाजिक संगठनों के अन्य प्रतिनिधियों द्वारा बताया गया कि विकसित भारत–गारंटी (VB-GRAM-G) में मनरेगा की अपेक्षा मजदूरों को काफ़ी कम अधिकार दिए गए हैं, काम की गारंटी है लेकिन गारंटी का सारा बोझ राज्य सरकारों पर थोप दिया गया है. झारखंड के परिप्रेक्ष्य में अगर मनरेगा को देखा जाये तो किसी भी माह में मानव सृजन में बहुत बड़ा अंतर देखने को नहीं मिलता है. इससे स्पष्ट है झारखंड में ऐसा वर्ग है जिसे हर माह में काम की जरूरत होती हैं. ऐसे में अगर 60 दिनों का अनिवार्य मोराटोरियम लगा दिया जाएगा तो काम नहीं रहने के कारण बहुत सारे मजदूरों के सामने भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी. कई सामाजिक संगठन के प्रतिनिधियों द्वारा मनरेगा को राज्य योजना के रूप चलाने का अनुरोध किया गया ताकि मजदूरों को उनका वास्तविक अधिकार और काम प्राप्त रह सके. बैठक के अंत में मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि आगामी छह महीनों में राज्य के अधिकतम परिवारों को कम से कम 100 दिनों का रोजगार सुनिश्चित करने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं, ताकि मनरेगा की मूल भावना, संवैधानिक गारंटी और गरीबों के अधिकारों की पूरी मजबूती से रक्षा की जा सके।